Tuesday, 11 June 2013

रोचक बातें अंतरिक्ष यात्रा से जुड़ी Sunday, September 11, 2011

एक प्रयास ---------

अंतरिक्षयात्रा के दौरान और उसके बाद अंतरिक्षयात्रियों को कई प्रकार के अनुभव होते हैं. ऐसे ही 7 अनुभवों के बारे में जानकारी.

अंतरिक्ष यात्रियों की शयन क्रिया---------

अंतरिक्षयात्रियों के लिए अंतरिक्ष में नींद लेना काफी कठीन हो जाता है. 
ऐसा इसलिए क्योंकि पृथ्वी की नजदीकी भ्रमण कक्षा में सूर्यास्त और सूर्योदय हर 90 मिनट में एक बार हो जाता है. 
इससे दिन और रात का समय ठीक ढंग से समझ पाना कठीन हो जाता है.

अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन में ग्रीनविच मीन टाइम को आधार माना जाता है और अंतरिक्षयात्री उसी समय के हिसाब से खुद को ढालते हैं. 
यह कठीन है परंतु उनको इसका अभ्यास कराया जाता है.

अंतरिक्षयात्रियों की लम्बाई बढ जाती है----------

चुँकि अंतरिक्ष में गुरूत्वाकर्षण बल का प्रभाव नहीं होता इसलिए अंतरिक्षयात्रियों की रीढ की हड्डी का कॉलम फैलता है और उनकी लम्बाई 5 से 8 सेमी तक बढ जाती है. 
पृथ्वी पर लौटने के बाद उन्हें पीठ दर्द की शिकायत होने की सम्भावना रहती है.

खर्राटों मे कमी---------------

एक अभ्यास से पता चला है कि अंतरिक्षयात्री जब अंतरिक्ष में नींद लेते हैं तो अपेक्षाकृत कम खर्राटे लेते हैं. 
ऐसा इसलिए क्योंकि खर्राटों के लिए गुरूत्वाकर्षणबल कुछ हद तक जिम्मेदार है और अंतरिक्ष में उसकी अनुपलब्धता खर्राटों मे कमी ला देती है.

एक वर्ष से अधिक समय तक अंतरिक्ष में------------

सुनिता विलियम्स जब 6 महीने के करीब अंतरिक्ष में रहकर वापस लौटी तो लोगों ने अचरज व्यक्त किया था, क्योंकि अंतरिक्ष में इतने लम्बे समय तक रहना आसान काम नहीं है. 
लेकिन अंतरिक्ष में सबसे लम्बे काल तक रहने का रिकार्ड सुनिता के नहीं बल्कि रूस के वलेरी पोलियाकोव के नाम है. 
उन्होनें मीर स्पेस स्टेशन में 438 दिन बिताए थे.

अंतरिक्ष में हुई कुल मौतें कितनी-------?

सिर्फ 3. वर्ष 2004 तक कुल 439 अंतरिक्षयात्री अंतरिक्ष की सैर कर चुके हैं. 
11 सम्भावित अंतरिक्षयात्रियों की मौत प्रशिक्षण के दौरान हुई है और उड्डयन के दौरान कुल 18 मौतें हुई है.

परंतु तकनीकी दृष्टि से देखें तो मात्र 4 मौते ही अंतरिक्ष में हुई है. 
एफ.आई.ए. के अनुसार पृथ्वी की सतह से 100 किमी ऊपर अंतरिक्ष की सीमा है. 
इस सीमा से बाहर सोयुज़ 11 अंतरिक्षयान की दुर्घटना हुई थी. 
तीन अंतरिक्षयात्री ज्योर्जी डोब्रोवोल्स्की, विक्टर पेटासायेव और व्लादिस्लेव वोल्कोव मारे गए थे.

पृथ्वी के वातावरण से सामंजस्य बिठाना कठिन---------

अंतरिक्षयात्रा के बाद लौटने वाले अंतरिक्षयात्रियों के लिए पृथ्वी के वातावरण से तालमेल बिठाना कठीन होने लगता है. 
 कठिन प्रशिक्षण प्राप्त ये अंतरिक्षयात्री भी परेशानी का सामना करते हैं. 
कई रूसी अंतरिक्षयात्री स्वीकार करते हैं कि पृथ्वी पर लौटने के महीनों बाद भी वे कॉफी के मग को हवा में छोड़ देते थे!

स्पंज स्नान ही बेहतर-------------

स्कायलेब, मीर जैसे स्पेस स्टेशन शावर की सुविधा से युक्त होते हैं. 
लेकिन अंतरिक्षयात्री अधिकतर समय स्पंज बाथ पर ही निर्भर रहते हैं 
ताकी पानी का बचाव किया जा सके.

नासा अब ऐसे सिस्टम पर कार्य कर रहा है जिससे पानी रिसायकल होता रहेगा. 
इसके बाद अंतरिक्षयात्रियों के लिए मजे से स्नान करना सम्भव होगा.

Monday, 10 June 2013

ऐसा क्यों भई ?

एक प्रयास ---------

आडवाणी जी की बात करें तो 
 उनका सपना रहा देश पर राज करना जो समय ने पूरा नही होने दियालेकिन लालसा बनी रही कुर्सी की जो आज भी बरकरार है 
लेकिन अब समय आडवाणी जी के भी
 सोचने का नही है क्या  ......
क्यों इतनी जिद ??? 
अपने बोये पेड़ के फल सबको खाने को नही मिलते ये तो वो अच्छी तरह जानते हैं ......... 
इस उम्र में बच्चा बन जाना सुना था आज उन्होंने  सार्थक कर दिया 
और ये पहली बार नही है ...
बाजपेयी के समय भी इनका यही रवैया था हाँ और फर्क ये है 
कि अटलजी के सामने चली नहीं...तब भी उपप्रधान मंत्री बन कर माने थे 
समय -समय पर सबको सत्ता छोडनी ही पड़ती है , परिवर्तन समय की मांग है सब जानते हैं 
..............थोड़ा बडप्पन दिखाना चाहिए उन्हें 
...............बड़े भी अपना सम्मान बनाए रहे यही उचित है  .......
उनके विरोध में कोइ नही है .........और ये मान गए तो सब मान जायेंगे ये भी पक्का है .
सम्मान उनका सभी करते हैं और कर रहे हैं ..........
लेकिन वो स्वयं ही मौक़ा दे रहे हैं हंसी उड़ाने का ................... स्वयं तो उपहास का पात्र बने खड़े ही हैं पार्टी की छवि भी धूमिल कर रहे हैं  हैं ...........
मुझे उनका ये कदम गलत लगता है ......
सबके सामने ठीकरा उनकी जिद ने फोड़ा वरना अन्दर भी बात हो सकती थी.....
नाराज़ रहते .....जो चाहे कहते लेकिन सबको मौक़ा तो ना देते ............और अब तो भगवान् ही मालिक है ...............वन्दे मातरम 

Sunday, 9 June 2013

एक लबादा जो आग से रखे महफूज़

एक प्रयास --------जिस चीज़ को आज ये वैज्ञानिक  अंजाम देने जा रहे हैं हमने देखी नहीं लेकिन सुना अवश्य है सालों पहले भारत में हिरन्यकश्यप ने इसी आग से बचाने वाले लबादे को अपनी बहन होलिका को ओढाकर जलती आग में बिठा दिया था जिस से वो जलने से बच सकती थी कहना ना होगा भारत तकनीकी स्तर पर सालों पहले भी बहुत आगे था 
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अनुसंधानकर्ताओं ने एक ऐसी लबादे सरीखी चीज़ का परीक्षण किया जो किसी वस्तु को आग से छुपाकर उसे सुरक्षित रख सकेगी.
वैज्ञानिक इसे ‘थर्मल इनविजिबिलिटी क्लोक’ नाम से पुकार रहे हैं. यह पहली बार हुआ है कि एक ऐसी डिवाइस बनाई गई है जो किसी वस्तु को ऊष्मा से भी बचा सकेगी.
इसका नमूना ‘फिज़ीकल रिव्यू लेटर्स’ में जारी किया गया है.
जारी किए गए नमूने का सैंद्धांतिक विचार साल 2012 में सबसे पहले फ्रांस के अनुसंधनकर्ताओं ने दिया था.
यह विचार अब हकीकत में बदल गया है.
तांबे और सिलिकॉन से बनी इस चीज को ‘पीडीएमएम’ का नाम दिया गया है.
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क्या बात है !!!!

एक प्रयास ---------
फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद इन दिनों जापान की तीन दिवसीय यात्रा पर हैं.
............उन्होंने वहां जापान को कह डाला चीन

फ़्रांस पीछे रह गया और हम आगे निकल गए
.............हमारे किशोर दा तो कब से गा कर चले भी गए
...........जाना था जापान पहुँच गए चीन .........................
.....................................................समझ गए ना फ्रांस्वा ओलांद ??????...
 

Saturday, 8 June 2013

गुड्डी के लाल

एक प्रयास ---------
सीबीएसई आज के दौर में जगह -जगह पाँव पसार गया है लेकिन पहले इस संस्था से कम और अपने -अपने राज्यों के बोर्ड से परीक्षार्थी ज़्यादा संख्या में परीक्षा देते थे






विभिन्न आय ने समाज में हर स्थान पर सबकी सीमा निश्चित  कर दी है
अभिजात्य वर्ग की प्रतिभाएं अनेक सुख -सुविधाओं के बीच अपना स्वप्न पूर्ण करती हैं , अति आधुनिक शिक्षा संस्थान उनकी प्रतिभा में चार चाँद लगा देते हैं और कई प्रतिभाएं विदेशी विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा के लिए चली जाती हैं तो कई देश के ही नामी-गिरामी संस्थाओं में प्रवेश पा भविष्य के सपने बुनते हैं


वहीँ एक वर्ग ऐसा है जो रोज़ नयी समस्याओं से जूझता , जिंदगी के नए चेहरे से दो -चार होता तंग हाली में जीता है लेकिन उनकी आँखों में बसे सपने कहीं अलग नही होते और उनका प्रयास रहता है उनके नौनिहालों के सपने रंग विहीन ना हो जाए या उनके सपनो का रंग फीका ना पड जाए

जो कमी धन के अभाव में रह जाती है वो उसे अपने मज़बूत मनोबल से, अपनी एकजुटता से  पूरा करने का प्रयास करते हैं | यही कारण है कि यदि सीबीएसई अभिजात्य वर्ग की प्रतिभाओं को सामने लाती है उनके सपनो को उड़ान देती है तो राज्य की बोर्ड परीक्षाएं अभावों में जीती अनेक प्रतिभाओं को सामने ला खड़ी करती हैं

जो विपरीत परिस्थितियों में भाग्य से लड़ कर अपना दबदबा बनाते हैं और नाम कमाते हैं , 
अमीर घराने का बच्चा यदि प्रतिभाशाली है तो उसे निखारने के लिए अनेक सुविधाएं बहुत सा समर्थन मिल जाता है हालांकि उसके परिश्रम को कम नही आँक सकते 


लेकिन यदि अभावों से जूझता बच्चा अपने परिश्रम मात्र से ही उनके समकक्ष खडा दिखाई दे तो कहना होगा कि माना -------------
पास्ता , पीजा और ठंडा कोक स्वादिष्ट लगते है ---स्वाद में बदलाव लाते हैं ,जीभ को भाते हैं ,
परन्तु दलिया , भुने चने और सत्तू की ठंडाई आज भी जीभ को उतना ही लपलपाते हैं .........
जय भारत ,जय भारत की प्रतिभाएं 



Friday, 7 June 2013

फिर पनप रहे हैं सदियों पहले बर्फ में दबे पौधे

एक प्रयास ---------




साल 1550 से 1850 तक के समय को 
लिटिल आइस एज के नाम से जाना जाता है

वैज्ञानिकों का मानना है कि 
सदियों पहले लिटिल आइस एज या 
क़रीब साढ़े चार सौ साल पहले 
ग्लेशियर के नीचे जम गए 
क्लिक करेंपौधे फिर से पनप रहे हैं.
चार सौ साल पुराने इन पौधों को ब्रायोफ़ाइट्स के नाम से जाना जाता है. 

Tuesday, 4 June 2013

मक्का की दिशा बताने वाली जानमाज़ 24 जुलाई, 2012

एक प्रयास ---------

इस्लाम धर्म के मानने वाले अज़ान 
सुनते ही दिन में पांच बार नमाज़ पढ़ने के 
लिए मक्का की ओर मुह करते हैं.
लेकिन जब आप मस्जिद में ना हों, और
 ना ही किसी जानी-पहचानी जगह पर 
तब आप क्या करेंगे?
ऐसे में कुछ लोग सितारों की तरफ़ देखते हैं,
 कुछ कंपास का प्रयोग करते हैं तो 
आजकल कुछ स्मार्ट फ़ोन का सहारा लेते हैं.
लेकिन लंदन स्थित तुर्की मूल के डिज़ाइनर 
ने इस समस्या का हल तकनीक से निकाला है. 
उन्होंने नमाज़ पढ़ने के लिए एक मैट बनाया है 
जिसे अल-सजदा नाम दिया है.



जैसे ही इसे मक्का की दिशा पता चलती है 
ये चमक उठता है.
सोनेर ओजेंक नाम के इस डिज़ाइनर ने  
बताया, “मैं उड़ने वाले कार्पेट के बारे में सोच रहा था. 
फिर हमें लगा कि इसे कैसे बनाया जाए..
और इसी से प्रेयर मैट का आइडिया आया. 
अल-सजदा का अहम बात ये है कि 
आपको इसके अलावा किसी अन्य 
सहायता की ज़रुरत नहीं पड़ती.”
सोनेर ओज़ेंक का दावा है कि 
अल-सजदा से नमाज पढ़ना 
आसान हो जाता है.
अल-सजदा अभी बाज़ार में नहीं आया है 
क्योंकि ओजेंक पैसों की तलाश में है 
ताकि इसे बाज़ार में उतारा जाए.