Thursday, 16 January 2014

मोदी जी की कविता

एक प्रयास ---------80 के दशक में लिखी गयी मोदी जी की यह कविता आप भी पढि़ए..

उत्सव
पतंग..मेरे लिए उ‌र्घ्वगति का उत्सव,
मेरा सूर्य की ओर प्रयाण।

पतंग..मेरे जन्म-जन्मांतर का वैभव,
मेरी डोर मेरे हाथ में..
पदचिन्ह पृथ्वी पर,

आकाश में..
विहंगम दृश्य सेसा,
मेरा पतंग..अनेक पतंगों के बिच,
मेरा पतंग उलझता नहीं..

वृक्षों की डालियों में फंसता नहीं..
पतंग..मानो मेरा गायत्री मंत्र,
धनवान हो या रंक,
सभी को..
कटी पतंग एकत्र करने का आनंद होता है।
बहुत ही अनोखा आनंद,
कटी पतंग के पास..

आकाश का अनुभव है.
हवा की गति और दिशा का ज्ञान है..
स्वयं एक बार ऊंचाई तक गया है वहां कुछ क्षण रुका है।
इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

पतंग..मेरा सूर्य की ओर प्रयाण..
पतंग का जीवन उसकी डोर में है।
पतंग का आराध्य (शिव) ब्योम (आकाश) में..

पतंग की डोर मेरे हाथ में..
मेरी डोर शिव जी के हाथ में..
जीवन रूपी पतंग के लिये (हवा के लिये),
शिव जी हिमालय में बैठे हैं।

पतंग के सपने (जीवन के सपने),
मानव से ऊंचे..
पतंग उड़ती है, शिव जी के आस-पास,
मनुष्य जीवन में बैठा - बैठा ..
उसको (डोर) सुलझाने में लगा रहता है।

एक आदमी जो बोलता है 30 भाषाएं

एक प्रयास ---------


जिस उम्र में बच्चे खेलना कूदना पसंद करते हैं 

उस उम्र में ग्रीस के क्रिट द्वीप के रहने वाले 

हिज़यानिइस इकोनोमुस को एक अलग ही शौक़ चढ़ा.
क्रीट एक पर्यटन स्थल है और इकोनोमुस बताते हैं 

कि उस ज़माने में वहां जर्मनी, जापान, डच और रुस के 

लोग आते रहते थे. 

इन सैलानियों के ये शब्द उन्हें समझ में तो नहीं आते थे 

लेकिन अपनी ओर आकर्षित ज़रुर करते थे











इकोनोमुस 30 भाषाएं बोल सकते हैं
ग़ुस्सासात साल की उम्र में ही उन्हें इन भाषाओं को समझने और बोलने की रुचि जगी. इकोनोमुस ज्यादातर यूरोपीय भाषाएं बोल लेते हैं. उसके अलावा वे मैंडरिन, अरबी, तु्र्की 
और फ़ारसी समेत 30 भाषाएं जानते हैं.

 वे यूरोपीय कमीशन में काम करते हैं.

इकोनोमुस बताते हैं कि उनके परिवार में लोग केवल ग्रीक्लिश भाषा बोलते हैं जिसमें अंग्रेज़ी ग्रीक लहजे में बोली जाती है. 
साथ ही उन्हें एक निजी स्कूल में अंग्रेज़ी भाषा सीखने के लिए भेजा जाता था.
तुर्की भाषा सीखने का अपना अनुभव बताते हुए वे कहते हैं, "जब मैंने अपने माता-पिता को कहा कि मुझे तुर्की सीखनी है तो उनकी त्योरियां चढ़ गईं. उस ज़माने में तुर्की लोगों को 'दुश्मन' समझा जाता था. 
लेकिन मुझे बचपन से सिखाया गया कि कोई दुश्मन नहीं होता सब दोस्त होते हैं और तुर्की भी तो इंसान ही हैं. 
मेरे माता-पिता यहां हर साल होने वाले विरोध प्रदर्शन में जाते थे जिसमें तुर्की शरणार्थी और नेता भाग लेते थे. उन्होंने इस प्रदर्शन में जाकर पूछा कि हमारा बेटा तुर्की सीखना चाहता है."




मुझे अभी भी याद है कि मेरी उस टीचर का नाम आयशे था. एक ग्रीक होने के कारण तुर्की भाषा सीखना विवादस्पद तो था ही.
इरोनोमुस के लिए सबसे मुश्किल मैंडरिन भाषा सीखना था.

मुश्किल----------------

इकोनोमुस कहते हैं कि मुझे सबसे ज्यादा कठिनाई मैंडरिन सीखने में आई जो मेरे लिए अभी भी एक चुनौती बना हुआ है.
वे बताते हैं कि न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी से क्लासिकल लैग्वेंजेज़ में स्नातक करने के बाद मुझे आगे की पढ़ाई करने के लिए कोलंबिया यूनिवर्सिटी जाना था 
लेकिन इस बीच में मेरे पास एक साल का समय था. मैंने मैंडरिन भाषा सीखने की सोची.
उनके अनुसार, ''मैं बीजिंग चला गया और वहां बीजिंग लैंग्वेज इंस्टीट्यूट में दाख़िला ले लिया. यूरोपीय भाषा से मैंडरिन का दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं था. 
इस भाषा को सीखना मेरे लिए बहुत बड़ी चुनौती थी लेकिन साथ ही मुझे इससे प्यार हो गया. हालांकि ये चुनौती अभी भी बनी हुई है. 
लेकिन मेरे सहयोगी जब इस भाषा को नहीं पढ़ पाते तो मुझे और मज़ा आता है. साथ ही यूरोपीय कमीशन जहां मैं काम कर रहा हूं वे मुझे एक साल में दो बार चीन भी भेजते हैं.''
कई भाषाओं के बोलने पर पैदा होने वाले असमंजस के बारे में वे बताते हैं कि जब एक भाषा बोलते हैं, मुहावरे भी बोलते हैं तो कई बार आप भी असमंजस में पड़ जाते हैं, तो कई बार एक शब्द के अलग-अलग मतलब होने पर फँस भी जाते हैं.

असमंजस-------------------

ऐसा ही एक अनुभव बताते हुए वे कहते हैं कि जब मैं ब्राज़ील में पुर्तगाली पढ़ रहा था तो आर यू श्योर पूछता था जिसे स्पेनिश भाषा में तस से व्यूरो कहा जाता है, जिसका मतलब होता है कि क्या आप सेफ़ हैं?
 तो पुर्तगाल में लोग सोचते थे कि मैं उनकी सेफ्टी को लेकर क्यों सवाल पूछ रहा हूं. ऐसी ही कई चीज़े अरबी, तुर्की और फ़ारसी में भी हैं.
 ये दिमाग़ में चलने वाला एक जिमनास्टिक है जो काफ़ी चुनौतीपूर्ण है.''
इकोनोमुस के मुताबिक़ उन्हें भाषाएं सीखने के बाद देशों के लोगों, उनकी परंपराओं और भोजन के बारे में जानने में आसानी हुई है.
वे कहते हैं कि उस ज़माने में न तो इंटरनेट था और न ही सैटेलाइट, ऐसे में भाषा सीखना मुश्किल था लेकिन अब ये काफ़ी आसान हो गया है.

Tuesday, 14 January 2014

मकर संक्रांति का पावन पर्व

एक प्रयास ---------हमारे यहाँ आज पतंग नहीं उडाई जाती .....
हमारे यहाँ बुलंदशहर में रक्षा बंधन पर और दिल्ली में वैसे तो १५ अगस्त को पतंग उड़ाने का आनंद उठाते हैं लोग ........
लेकिन आज के दिन भी लोग खूब पतंग उड़ाते हैं ..........
देश के बहुत से हिस्से में जम कर पतंग उड़ाने का आनद उठाया जाता है ........
आज भी दिन भर डोर के माध्यम से आसमान को चूमती पतंग उडती रही , मज़बूत मांझे ने धाक जमाई ..... 
कमज़ोर मांझे ने मुँह की ज़रूर खायी लेकिन हिम्मत से सामना किया .......
और हौसले उसके भी बुलंद रहे .........आसमान में उसने भी उंचाई तक जगह बनायी ......
पतंग कट जाने पर भी , गिर जाने पर भी ऊँची और ऊँची उडती नज़र आई
...........मांझा और पतंग पूरक हैं एक दूसरे के .........
मांझा कितनी ईमानदारी से कट कर ,टूट कर भी पतंग को आसमान में उंचाई तक पहुंचाता है ...........
उडती पतंग सिर्फ एक खेल ,प्रतिस्पर्धा या एक मनोरंजन ही नहीं ------------
---प्रतीक है उड़ान भरते स्वप्नों का ,स्वस्थ राह बना प्रतियोगिता में आगे बढ़ने जाने का
.............सब के स्वप्न यूँही उड़ान भरें , सब अपनी राह पर आगे और आगे बढे .......
असफलता से हार ना मान और ऊँची उड़ान भरें ...............
मकर संक्रांति के पावन पर्व पर सबको एक बार फिर से शुभकामनाएं .............

Saturday, 11 January 2014

# काश ऐसा होता ...!!!

एक प्रयास ---------
 आरम्भ से ही मन में था कि कलम के माध्यम से कुछ करूँ..!!
थोडा बहुत चल जाती थी .........लेकिन शायद विश्वास कुछ कम था अपने पर .....

जब कालेज मैगजीन में लगातार दो वर्ष मेरे लेख छपे
और कालेज उत्सव में मैंने कविता पढ़ी तो विश्वास बढा !!!
लगा मेरी लेखनी बहुत कुछ कहती है और इसे आगे लेकर जाउंगी ,सोच लिया था मैंने 
 सब कुछ बहुत सुविधाजनक तो नहीं था लेकिन घर से कोई विरोध नहीं था ,
बल्कि कहूँगी पूरा समर्थन प्राप्त था और इसी कड़ी में मैंने सोचा क्यों न पत्रकार बना जाए
देखते हैं क्या कर पाते हैं ....!! 

फिर खोज बीन कर 'बरेली पत्रकारिता संस्थान से' पत्रकार का कोर्स करने का निश्चय किया 
..












एडमिशन लिया गया लेकिन इसके कुछ दिन बाद ही शादी हो गयी ......
और इधर -उधर के चक्कर में ये सब छूट गया .......स्वप्न पूरा ना हो सका
फिर परिस्थिति ने साथ नहीं दिया और मैं इसे पूरा नहीं कर पायी .....
हमें सब कुछ कहाँ मिलता है ......जिसके हिस्से में जो ,जितना है वही मिलेगा
कब मिलेगा ये भी निश्चित किया है इश्वर ने .......

आज ये पहचान पत्र मेरे टूटे स्वप्न का प्रतीक बन गया..
 यहाँ किसी को दोष नहीं देना चाहती, मेरी इच्छाशक्ति में ही कही  कमी रही ......
आज भी मन में पश्चाताप है ......कसक है ..........
आज ये पहचान पत्र देख फिर से उन्ही दिनों में वापस पहुँच गयी हूँ .......
काश थोडा मजबूती से सोचती और ..!!......
अडिग रहती तो हो सकता है कोई रास्ता निकल पाता

.'काश ऐसा होता' ....!! और मैं आगे बढ़ पाती .....
पर नियम है प्रकृति का  हमेशा मन चाहा नहीं हो सकता .....
लेकिन कोई बात नहीं आज अपनी बात कहने का एक मंच है मेरे पास
लोकतंत्र है .........जो चाहे लिखिए 
और साथ ही उन दिनों की बातें बांटने के लिए ढेर सारे दोस्त ..........सादर 




Friday, 10 January 2014

शत-शत नमन

एक प्रयास ---------छोटे कद और बड़े हौसले वाले देश के लाल को पुण्यतिथि पर शत-शत नमन 

Thursday, 9 January 2014

एक प्रयास ---------राहुल गाँधी को अगर 'ट्विटर' और फेसबुक चलाना नहीं आता .!!!!
........तो भाई एकाउंट बंद कर दो भैया ..............कोई ज़रूरी है ..??
......काहे ५०० करोड़ रुपय्ये पानी में बहा रहे हो .......

Tuesday, 7 January 2014

कश्मीर

एक प्रयास ---------
खर्शीद साहब ने तो आज तक सिर्फ बिरयानी खिलाई है ......
प्रशांत भूषण तो मौक़ा मिलते ही तोहफे में दे देंगे कश्मीर ............