Friday, 16 May 2014

हार्दिक बधाई ..

एक प्रयास ---------अरे क्या था ये हवा ,आंधी , प्रचंड वेग से आया तूफ़ान .........??
आस-पास से सब उड़ गए ........
सभी भारत वासियों को हार्दिक बधाई .......हर राष्ट्रवादी को बधाई ......
जो वंचित रह गए थे १९४७ की खुली हवा के प्रथम अनुभव से आज अवसर है उन सब के लिए ...
हम सब के लिए ....खुल कर सांस लें और अनुभव करें सचमुच की आज़ादी .......
..................जय हिन्द .......जय भारत ..............वन्दे मातरम .............

Thursday, 15 May 2014

ज़ायके के ज़रिए अमन का पैग़ाम

एक प्रयास -----
  • सरहद रेस्त्रां
    भारत और पाकिस्तान सीमा से सिर्फ़ 1.5 किलोमीटर की दूरी पर है '
  • सरहद' रेस्टोरेंट जो 'इस पार' और 'उस पार' की साझा पंजाबी 
  • तहज़ीब की जीती जागती धरोहर के रूप में खड़ा है. 
  • सरहद रेस्त्रां
    कमाल की बात यह है कि 
  • 'सरहद' रेस्टोरेंट अमृतसर से 28 किलोमीटर की दूरी पर है 
  • जबकि ये लाहौर से ज़्यादा क़रीब है. 
  • लाहौर से सरहद रेस्टोरेंट की दूरी 22 किलोमीटर है.
  • सरहद रेस्त्रां
    इस रेस्टोरेंट की ख़ास बात ये है कि 
  • इसका नक्शा और वास्तुकला पाकिस्तान के
  •  पंजाब प्रांत के लाहौर की जामा मस्जिद जैसी है, 
  • जबकि इसके फ़र्श में जिन टाइलों का इस्तेमाल किया गया है 
  • वो अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में इस्तेमाल की गईं टाइलों जैसी है.
  • सरहद रेस्त्रां
    साज सज्जा में एक और ख़ास बात है. 
  • यहां बावर्चीखाने की दीवारों पर पकिस्तान की 'ट्रक हस्तकला' का इस्तेमाल किया गया है. 
  • लाहौर के रहने वाले नामी कलाकार हैदर अली ने ख़ुद यहां आकर इन्हें बनाया है.
  • सरहद रेस्त्रां
    'सरहद' रेस्टोरेंट के मालिक अमन जसपाल का कहना है कि 
  • उनका उद्देश्य दोनों तरफ़ की पंजाबियत को प्रोत्साहित करना है.
  • सरहद रेस्त्रां
    विभाजन से पहले पूरा पंजाब एक हुआ करता था. 
  • और 'सरहद' में विभाजन के पहले के अख़बार भी लगाए गए हैं
  •  जिससे अविभाजित भारत के इस इलाक़े के बारे में महत्वपूर्ण ख़बरें पढ़ने को मिलती हैं.
  • सरहद रेस्त्रां
    इस रेस्टोरेंट में बनने वाले व्यंजन भी बिलकुल अलग हैं. 
  • यहां पर 'लाहोरिया' व्यंजन या फिर पकिस्तान के
  •  पंजाब के व्यंजन काफ़ी लोकप्रिय हैं. 
  • इन व्यंजनों में इस्तेमाल होने वाले मसाले भी लाहौर से ही मंगाए जाते हैं.
  • सरहद रेस्त्रां
    'सरहद' रेस्टोरेंट, दोनों तरफ़ के पंजाब के पारंपरिक
  •  पकवानों का एक ऐसा ठिकाना बन गया है 
  • जहां अब दूर दूर से लोग आने लगे हैं.
  • सरहद रेस्त्रां
    खाने के अलावा पाकिस्तानी फ़ैशन
  •  डिजाइनरों के तैयार किए गए कपड़ों को भी यहाँ रखा गया है.
  • सरहद रेस्त्रां
    रेस्टोरेंट के मालिक अमन का कहना कि सरहद रेस्टोरेंट को 
  • वो सिर्फ़ एक ढाबा नहीं बल्कि 'अमन का एक संग्रहालय' बनाना चाहते हैं.
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Saturday, 10 May 2014

१०मई -१८५७ का भारतीय विद्रोह,

एक प्रयास ---------१८५७ का भारतीय विद्रोह, जिसे प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम
सिपाही विद्रोह और भारतीय विद्रोह के नाम से भी जाना जाता है 
ब्रितानी शासन के विरुद्ध एक सशस्त्र विद्रोह था। 
यह विद्रोह दो वर्षों तक भारत के विभिन्न क्षेत्रों में चला। 
इस विद्रोह का आरंभ छावनी क्षेत्रों में छोटी झड़पों तथा आगजनी से हुआ था 
परन्तु जनवरी मास तक इसने एक बड़ा रुप ले लिया। 
विद्रोह का अन्त भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी के शासन की समाप्ति के साथ हुआ, 
और पूरे भारत पर ब्रितानी ताज का प्रत्यक्ष शासन आरंभ हो गया जो अगले ९० वर्षों तक चला।

१८५७ का प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम-10 मई

एक प्रयास ---------1857-59' के दौरान हुये भारतीय विद्रोह के प्रमुख केन्द्रों: 
मेरठदिल्ली,कानपुर , लखनऊझाँसी, और ग्वालियर को दर्शाता सन 1912 का नक्शा।

Tuesday, 6 May 2014

दोष सिर्फ दिल के काले गोरों को ही नहीं दे सकते .....जब नाम ही दर्ज नहीं था तो ?????

एक प्रयास -----#भगत सिंह पर खुलासा, बिना FIR दी थी फांसी---
दोष सिर्फ दिल के काले गोरों को ही नहीं दे सकते ..............
जब नाम ही दर्ज नहीं था तो ?????

शहीद-ए-आजम भगत सिंह को फांसी दिए जाने के 83 साल बाद एक बड़ा खुलासा सामने आया है। 
ब्रिटिश पुलिस अफसर जॉन सैंडर्स की हत्या के मामले में 
पाकिस्तान के लाहौर में दर्ज एफआईआर में भगत सिंह का नाम नहीं था।

भगत सिंह को सैंडर्स की हत्या के आरोप में महज 23 साल की उम्र में मार्च 1931 में सजा-ए-मौत दी गई थी।

पाकिस्तान में भगत सिंह मेमोरियल फाउंडेशन के अध्यक्ष इम्तियाज कुरैशी न
 सैंडर्स की हत्या के मामले में दर्ज एफआईआर की कॉपी हासिल की है।

ऊर्दू में लिखी एफआईआर 17 दिसंबर 1928 को 
शाम साढ़े चार बजे लाहौर के अनारकली थाने में दर्ज कराई गई थी,

जिसमें 2 अज्ञात लोगों पर सैंडर्स की हत्या का आरोप लगाया गया।

शिकायतकर्ता इसी थाने का एक अधिकारी था और मामले का चश्मदीद भी था।

उसके मुताबिक जिस शख्स का उसने पीछा किया वो पांच फुट पांच इंच लंबा था, 
हिंदू चेहरा, छोटी मूंछें और दुबली पतली और मजबूत काया थी।

वह सफेद रंग का पायजामा और भूरे रंग की कमीज और काले रंग की छोटी क्रिस्टी जैसी टोपी पहने हुए था।

मामला भारतीय दंड संहिता की धारा 302, 120 और 109 के तहत दर्ज किया गया था।

Thursday, 17 April 2014

हद है

एक प्रयास ---------फेस बुक पर कई मित्रों की पोस्ट देखती हूँ आज-कल जो आज़ाद भारत की विदेशी सरकार और लोकतंत्र के राजवंशीय परिवार के अंध समर्थक हैं | 
धर्मनिरपेक्षता के नाम पर एक सम्प्रदाय को खूब वोट बेंक बनाया जा रहा है उनके लिए करना कुछ नहीं बस उनकी भावनाओ को भड़काना है और फिर मरहम लगाना है |
साठ सालों में कुछ नहीं किया अब नौकरी देंगे , ये करेंगे , वो करना चाहते हैं .........!!!!!
मुझे समझ नहीं आता राजवंश के अंध-भक्त लोग सोचने -समझने की शक्ति गँवा बैठे हैं क्या ??
उन्हें कुछ लेना -देना नहीं कि देश रसातल में जा रहा है 
पिछले दस सालों में तो ज़मीन -आकाश , जल - पाताल सब खा गए .........
लेकिन भक्त अभी भी चरणों में झुकने को तैयार हैं , आरती उतारने को तैयार हैं 

Saturday, 5 April 2014

अपने ही घर में अज्ञातवास झेलता रहा एक महान व्यक्तित्व

एक प्रयास ---------

परिवार ने माना गुमनामी बाबा ही थे 'नेताजी'


नेताजी सुभाषचंद्र बोस के भाई की पौत्री जयंती रक्षित और तापती घोष ने माना कि फैजाबाद के रामभवन में अंतिम सांस लेने वाले गुमनामी बाबा ही नेताजी सुभाषचंद्र बोस थे। 

उन्होंने कहा कि उनके पास से मिले सामान, लिखावट व शौक आदि से पता चलता है कि भगवन जी के नाम से विख्यात रहे शख्स कोई और नहीं बल्कि नेताजी सुभाषचंद बोस थे। 


उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय को इसे संज्ञान में लेकर एसआइटी गठित कर यह जांच करवाना चाहिए कि आखिर भगवन जी के पास से मिले सामान किसके हैं और भगवन जी कौन थे? तो सारे तथ्य खुद सामने आ जाएंगे। इससे यह भी प्रमाणित हो जाएगा कि भगवन जी ही नेता जी थे।

सिविल लाइंस स्थित रामभवन में आयोजित पत्रकार वार्ता में उन्होंने कहा कि पहले भी इस प्रकार की बातें कई बार सामने आई कि फलां साधु नेताजी सुभाषचंद बोस हैं, लेकिन कोई ठोस आधार नहीं मिला। 

इसके बाद जब मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट में यह सामने आया कि नेताजी की मौत ताईवान में नहीं हुई। 

तब उन्होंने मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट को पढ़ा और गहन छानबीन की। 

इसके बाद पता चला है कि गुमनामी बाबा के नाम से पहचान पाने वाले ही नेताजी थे। 

उन्होंने कहा कि यदि ऐसा नहीं होता तो हाईकोर्ट ने गुमनामी बाबा के सामान को सुरक्षित रखने का आदेश क्यों दिया? 

जबकि किसी आम शख्स के लिए ऐसा नहीं किया जाता। 

उन्होंने कहा कि उन्हें यह भरोसा नहीं है कि यदि सरकार जांच कराएगी तो सारे तथ्य सामने आएंगे। 

इसलिए उच्च न्यायालय को प्रकरण का संज्ञान लेना चाहिए और सारे तथ्यों की छानबीन करानी चाहिए।

इस मौके पर पीस पार्टी के विधानमंडल दल के नेता अखिलेश सिंह ने कहा कि उन्होंने गत वर्ष सदन में इस विषय पर चर्चा कराने की मांग की थी, लेकिन एक साल गुजर गए पर सरकार ने चर्चा नहीं कराई। 

लेकिन साफ़ और सच ये है कि नेताजी के मसले पर सरकार गंभीर नहीं है।